
पता नही किस रास्ते जाना है
0, April 25, 2010
पता नही किस रास्ते जाना है
कहाँ अपनी मंज़िल और कहाँ ठिकाना है
राह भी तो सॉफ नज़र नही आती
बिन जाने ही सही पर चलते जाना है
इंतजार है कोई आए, हमारा हमराह बने
हमारी ज़िंदगी भी किसी की चाह बने
आ गया है कोई हमारा ऐसा लगता है
हमने उसे ही अपना हमकदम माना है
जब राह चुनने की बारी आई
साथ चुनने की बारी आई
उन्ही के साथ चलने लगे हम
बिन जाने किस रास्ते जाना है
जहाँ कहता है मंज़िल के बिना ज़िंदगी नही होती
बिन चाहत के कभी बंदगी नही होती
हमने अपनी मंज़िल से कहा हमारे लिए रुकना
उसने कहा तुम रूको, हमें जाना है
