
वो है हमसे ख़फा ख़फा
0, April 2, 2010
हैरान है आज हम ये देखकर की आज सो गये वो हमसे होकर ख़फा,
आज हुआ है ये पहली बार और लिख दिया जिंदगी ने ये फलसफा.
आज तो रात कटेगी लड़ते लड़ते तन्हाई से,
के क्यूँ नही हुई उनसे बात क्यूंकी शायद वो थे हमसे खफा ख़फा
लिख रहा हूँ ये अल्फ़ाज़ भी मैं उदास होकर,
क्यूंकी कर दिया है हमने अपनी जान को अपने आपसे ख़फा
ए खुदा अब बता तू ही की करूँ में क्या,
क्यूंकी रूठा है मेरा सनम और है तोड़ा खफा ख़फा
आज तो चाँद भी है पूरे शबाब पर और खुश सा,
शायद चिढ़ा रहा है मुझको क्यूंकी मेरा चाँद है ख़फा ख़फा
अब तो बस है यही एक आशा की एक किरण,
की भूल जाएँगे हुमारी ग़लतियों को और शायद वो ना रहे कल हुंसे ख़फा ख़फा
